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कटनी में महाशिवरात्रि का उत्साह: प्रमुख शिव मंदिरों में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़, सुबह से जलाभिषेक और बारातों का सिलसिला

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यह पर्व भक्ति, एकता और आध्यात्मिकता का प्रतीक बना रहा, जहां कटनीवासी भोलेनाथ की कृपा पाने के लिए एकजुट दिखे। जय भोलेनाथ! जय महाकाल! की गूंज रही।

यह पर्व भक्ति, एकता और आध्यात्मिकता का प्रतीक बना रहा, जहां कटनीवासी भोलेनाथ की कृपा पाने के लिए एकजुट दिखे। जय भोलेनाथ! जय महाकाल! की गूंज रही।

कटनी, 15 फरवरी 2026: महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर कटनी जिला भक्ति और आस्था के रंग में रंग गया। सुबह से ही जिले के प्रमुख शिव मंदिरों में भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा। श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ के दर्शन, जलाभिषेक और विशेष पूजन-अर्चना के लिए पहुंचे। कई स्थानों पर भव्य बारातें निकाली गईं, जिनमें ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे गूंजते रहे।

शहर और आसपास के इलाकों से हजारों की संख्या में लोग मंदिरों में पहुंचे, जिससे पूरे जिले में धार्मिक उत्साह का माहौल छाया रहा।रूपनाथ धाम (बहोरीबंद): प्राकृतिक सौंदर्य और ऐतिहासिक महत्व से युक्त यह धाम महाशिवरात्रि पर विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। पहाड़ी पर स्थित प्राचीन कुंडों—सीता कुंड, लक्ष्मण कुंड और राम कुंड—की मान्यता है कि भगवान राम वनवास के दौरान यहां आए थे। गुफा में विराजमान पंचलिंगी शिव प्रतिमा ‘रूपनाथ’ के नाम से प्रसिद्ध है।

यहां सम्राट अशोक के शिलालेख भी मौजूद हैं, जो 232 ईसा पूर्व के इतिहास को दर्शाते हैं। मान्यता है कि जागेश्वर धाम के लिए भोलेनाथ यहीं से प्रस्थान किए थे। शिवरात्रि पर श्रद्धालुओं ने प्राकृतिक कुंडों में स्नान कर जलाभिषेक किया और पूजन-अर्चना में भाग लिया। प्रकृति की गोद में बसा यह स्थल दूर-दूर से भक्तों को आकर्षित करता रहा।

विजयनाथ धाम (बरही): करीब 120 वर्ष पुराना यह मंदिर अपनी अनोखी कथा के लिए जाना जाता है। जनश्रुति है कि अंग्रेजी काल में थानेदार दुर्गा प्रसाद पांडेय को स्वप्न में भगवान शिव ने दर्शन दिए और दबी हुई शिवलिंग की जानकारी दी। खुदाई के बाद निकला शिवलिंग छोटा था, लेकिन हर साल इसका आकार बढ़ता जा रहा है—यह चमत्कार आज भी भक्तों को आश्चर्यचकित करता है। महाशिवरात्रि पर यहां भव्य शिव बारात निकाली गई, जिसमें स्थानीय और आसपास के भक्त शामिल हुए।

हर सोमवार की तरह विशेष शृंगार और आरती के साथ आज का उत्साह दोगुना रहा। मंदिर की 17 एकड़ भूमि का दान एक मुस्लिम परिवार द्वारा किया गया था, जो कौमी एकता का प्रतीक है।मधई मंदिर (कटनी शहर): विश्वकर्मा पार्क में स्थित यह शहर का सबसे प्राचीन शिव मंदिरों में से एक है, जिसकी उम्र 200 वर्ष से अधिक बताई जाती है। कथा है कि 1817 में एक शिवभक्त को स्वप्न में भोलेनाथ ने जंगल में प्रकट होने की सूचना दी। जमीन खोदकर शिवलिंग निकाला गया और प्राण-प्रतिष्ठा की गई। प्राकट्य के बाद तीन दिनों तक महोत्सव मनाया गया।

1950 में मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ और भव्य रूप में स्थापित किया गया। महाशिवरात्रि पर यहां सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रही। भक्त बड़े उत्साह से जलाभिषेक और पूजन कर रहे थे। शाम को भव्य बारात और शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें शहर भर से लोग शामिल हुए।

महाशिवरात्रि के इस अवसर पर कटनी के अन्य मंदिरों जैसे नीलकंठेश्वर धाम आदि में भी भक्तों की भीड़ देखी गई, जहां बारातें और विशेष अनुष्ठान हुए। पूरे जिले में ‘बम-बम भोले’ और ‘हर-हर महादेव’ के नारे गूंजते रहे। पुलिस और प्रशासन ने भीड़ प्रबंधन के लिए पर्याप्त इंतजाम किए, ताकि श्रद्धालु निर्विघ्न दर्शन कर सकें।

यह पर्व भक्ति, एकता और आध्यात्मिकता का प्रतीक बना रहा, जहां कटनीवासी भोलेनाथ की कृपा पाने के लिए एकजुट दिखे। जय भोलेनाथ! जय महाकाल! की गूंज रही।

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