श्रेय की राजनीति और जनता का दोहरा बोझ: कटनी नगर निगम का प्रशासनिक चेहरा
अंततः, शासन का उद्देश्य जनसेवा है, न कि श्रेयार्जन। जब तक स्थानीय निकाय राजनीतिक अखाड़े बने रहेंगे, तब तक छोटी-छोटी राहतें भी बड़ी पीड़ा बनती रहेंगी।
अंततः, शासन का उद्देश्य जनसेवा है, न कि श्रेयार्जन। जब तक स्थानीय निकाय राजनीतिक अखाड़े बने रहेंगे, तब तक छोटी-छोटी राहतें भी बड़ी पीड़ा बनती रहेंगी।

कटनी नगर निगम क्षेत्र में जलकर पर चक्रवृद्धि ब्याज को समाप्त करने का फैसला निस्संदेह एक सकारात्मक कदम है। वर्षों से ‘गुंडा टैक्स’ या ‘जजिया टैक्स’ कहे जाने वाले इस अतिरिक्त बोझ से आमजन, खासकर गरीब परिवारों को राहत मिली है।
लेकिन यही राहत श्रेय की होड़ में उलझकर अपनी मर्यादा खो रही है, और उसी के साथ संपत्ति कर की भारी बढ़ोतरी ने एक नया बोझ लाद दिया है। यह घटना स्थानीय शासन की उस विडंबना को उजागर करती है, जहाँ छोटी-छोटी प्रशासनिक सुधारों को भी राजनीतिक पूंजी में बदला जाता है, जबकि जनता का असली दर्द अनदेखा रह जाता है।
2013 में तत्कालीन महापौर श्रीमती निर्मला पाठक के कार्यकाल में इस मुद्दे की प्रक्रिया शुरू हुई थी। सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों ने इसे लगातार उठाया। कुछ तकनीकी पहलू बचे थे, जिन्हें अब आयुक्त तपस्या परिहार (आईएएस) ने सुलझाया। समाजसेवी इंद्र मिश्रा ने भी प्रशासन तक यह मांग पहुंचाई।
अंततः म्यूनिसिपल इंटरनल कमेटी (MIC) ने प्रस्ताव पारित कर चक्रवृद्धि ब्याज को पूरी तरह समाप्त कर दिया। यह फैसला स्वागत योग्य है, क्योंकि जलकर पर चक्रवृद्धि ब्याज न केवल अनुचित था, बल्कि गरीबों के लिए दमनकारी भी। पानी एक मौलिक अधिकार है, न कि राजस्व का साधन।
फिर भी, इस राहत को घेरकर जो राजनीतिक बयानबाजी शुरू हुई, वह दुखद है। कुछ जनप्रतिनिधि इसे अपना ‘करिश्मा’ बता रहे हैं, जबकि विपक्ष इसे ‘सामूहिक प्रयास’ कहकर अपना हिस्सा मांग रहा है। सवाल यह है—क्या लोकतंत्र में जनहित के काम भी श्रेय की होड़ का शिकार बन जाएंगे? 13 साल तक लंबित रहने वाला एक सरल प्रशासनिक निर्णय, जो 2013 में ही पूरा हो सकता था, आज अचानक ‘उपलब्धि’ बन गया है। यह देरी ही हमारे स्थानीय शासन की सबसे बड़ी विफलता है—जहाँ नौकरशाही की जड़ता और राजनीतिक उदासीनता आम आदमी के हक को वर्षों तक लटकाए रखती है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जलकर पर राहत के साथ ही संपत्ति कर में भारी बढ़ोतरी ने जनता को नया झटका दिया है। पहले ₹90 का टैक्स अब ₹3200 तक पहुंच गया है। कई गरीब परिवारों के पानी के कनेक्शन 15-20 साल पहले काट दिए गए थे, अब पुराने बिल भेजे जा रहे हैं। नागरिक पूछ रहे हैं—क्या जलकर की राहत को संपत्ति कर बढ़ाकर ऑफसेट किया जा रहा है? यह प्रश्न गहरा है। नगर निगमों की आय बढ़ाने की मजबूरी समझी जा सकती है, लेकिन जब बढ़ोतरी बिना पारदर्शिता, बिना जन-परामर्श और बिना किसी वैज्ञानिक मूल्यांकन के की जाती है, तो वह अन्याय बन जाती है। संपत्ति कर गरीबों की छोटी-छोटी संपत्तियों पर भी बोझ बन रहा है, जबकि बड़े व्यावसायिक भवन अक्सर इस जाल से बच निकलते हैं।
यह दोहरा चेहरा भारतीय नगरपालिका व्यवस्था की व्यापक समस्या को दर्शाता है। एक ओर जनता को राहत दी जाती है, दूसरी ओर नई कर-वसूली का जाल बिछाया जाता है। श्रेय की राजनीति यहां सिर्फ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही की कमी का प्रतीक है। जब प्रशासन और जनप्रतिनिधि दोनों ही ‘मेरा काम’ कहकर आगे बढ़ते हैं, तो असली सवाल दब जाता है—क्या यह काम समय पर, पारदर्शी तरीके से और बिना नए बोझ के किया गया? कटनी का मामला पूरे मध्य प्रदेश के नगर निगमों के लिए आईना है।
जनता अब साफ मांग कर रही है—राहत को राहत ही रहने दो। जलकर पर मिली छूट को संपत्ति कर बढ़ाकर बेअसर न किया जाए। साथ ही, पुराने बिलों की वसूली पर रोक लगाई जाए और कर-संरचना में न्यायसंगत संशोधन किया जाए।
अंततः, शासन का उद्देश्य जनसेवा है, न कि श्रेयार्जन। जब तक स्थानीय निकाय राजनीतिक अखाड़े बने रहेंगे, तब तक छोटी-छोटी राहतें भी बड़ी पीड़ा बनती रहेंगी। कटनी नगर निगम को अब यह चुनना होगा—क्या वह जनता के प्रति जवाबदेह बनेगा, या श्रेय की होड़ में उलझा रहेगा? सच्ची उपलब्धि वही है, जो बिना शोर के, बिना नई मार के, आम आदमी तक पहुंचे। समय आ गया है कि प्रशासन इस सच्चाई को समझे।
