कटनी। जिला मुख्यालय से मात्र 42 किलोमीटर दूर बसे ग्राम कारीतलाई में 5वीं सदी के कल्चुरी, गुप्त, बौद्ध और जैन काल की बेमिसाल मूर्तिकला आज भी उपेक्षा की धूल फाँक रही है।
खजुराहो की तर्ज पर विश्व प्रसिद्ध हो सकने वाले इस स्थल को पर्यटन महत्व का स्थान घोषित करने और पुरातत्व संरक्षण की मांग पिछले कई दशकों से अनसुनी पड़ी है।
स्थानीय लोग और पुरातत्व प्रेमी लगातार जनप्रतिनिधियों से इस दिशा में ठोस कदम उठाने की गुहार लगा रहे हैं।यहाँ मौजूद विष्णु-वराह मंदिर परिसर में 493 ईसवी के अभिलेखयुक्त अवशेष, दस फुट ऊँची एक ही शिला पर तराशी गई भगवान विष्णु-वराह की अद्भुत प्रतिमा, भगवान गणेश, शिव-पार्वती, सलभंजिका सहित सैकड़ों दुर्लभ मूर्तियाँ हैं।
प्राचीन गोड़ बस्ती के अवशेष, विशाल तालाब, प्राचीन पाठशाला और स्मारक भी यहाँ मौजूद हैं। मान्यता है कि कल्चुरी नरेश राजा कर्ण ने अपने नाम पर ही कर्णपुरा (वर्तमान कारीतलाई) बसाया और यहाँ भव्य मंदिर-मूर्तियों की स्थापना कराई थी।
यहाँ से प्राप्त कई महत्वपूर्ण शिलालेख आज रायपुर, रानी दुर्गावती संग्रहालय (जबलपुर) और ग्वालियर संग्रहालय में संरक्षित हैं।
लेकिन सबसे दुखद घटना 17 अगस्त 2006 की रात हुई जब कारीतलाई पुरातत्व संग्रहालय से 9 अनमोल मूर्तियों की चोरी हो गई। बाद में भगवान विष्णु और सलभंजिका की दो प्रतिमाएँ अमेरिका में मिलीं।
फोटोग्राफ के आधार पर पहचान होने के बाद इन्हें वापस लाने की कवायद अभी भी जारी है।स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर समय रहते सरकार ने ध्यान दिया होता तो आज कारीतलाई मध्य प्रदेश का एक प्रमुख पर्यटन स्थल होता और अंतरराष्ट्रीय स्मगलरों के निशाने पर नहीं आता।
अब एक बार फिर ग्रामीणों ने जिला प्रशासन, पुरातत्व विभाग और जनप्रतिनिधियों से मांग की है कि कारीतलाई को शीघ्र पर्यटक स्थल घोषित कर संरक्षण और विकास कार्य शुरू किया जाए, ताकि यह अनमोल धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रहे और क्षेत्र को आर्थिक लाभ भी मिले।
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