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सिस्टम की सुस्ती: कटनी में ESI विभाग की लापरवाही से 16 हजार के मेडिकल क्लेम में फंसा मरीज, 4 महीने से ‘तारीख पर तारीख’ का सिलसिला

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स्थानीय लोग और हितग्राही ऐसे मामलों में तेजी से कार्रवाई और पारदर्शी प्रक्रिया की मांग कर रहे हैं ताकि छोटे-छोटे क्लेम भी समय पर निपटाए जा सकें।

स्थानीय लोग और हितग्राही ऐसे मामलों में तेजी से कार्रवाई और पारदर्शी प्रक्रिया की मांग कर रहे हैं ताकि छोटे-छोटे क्लेम भी समय पर निपटाए जा सकें।

कटनी (मध्य प्रदेश), सरकारी विभागों की लापरवाही और फाइलों में दफन हो रही आम आदमी की परेशानियां एक बार फिर सुर्खियों में हैं। कटनी के हितग्राही जिलाजीत सिंह अपने बेटे के इलाज के मात्र 15,963 रुपये के मेडिकल रीइम्बर्समेंट क्लेम के लिए पिछले 4 महीनों (110 दिनों से अधिक) से राज्य बीमा कर्मचारी चिकित्सालय (ESI) और श्रम विभाग की सुस्ती का शिकार बने हुए हैं।

मामला इतना छोटा है कि महज 16 हजार रुपये के लिए फाइल तीन शहरों—कटनी, जबलपुर और इंदौर—के चक्कर काट रही है, जबकि भुगतान तुरंत होना चाहिए था।लापरवाही का क्रोनोलॉजी: महीनों का इंतजार7 नवंबर 2025: कटनी ESI केंद्र से पहला पत्र (क्रमांक 1151) जबलपुर भेजा गया। यहां से ही शुरुआती देरी शुरू हुई।1 जनवरी 2026: लगभग दो महीने बाद फाइल जबलपुर से इंदौर (नंदानगर) स्थानांतरित की गई।21 जनवरी 2026: मजबूर होकर जिलाजीत सिंह ने सीएम हेल्पलाइन (शिकायत क्रमांक 36444942) पर शिकायत दर्ज कराई।

4 से 13 फरवरी 2026: विभाग के ‘निराकरण अधिकारी’ ने समय पर कोई कार्रवाई नहीं की। निर्धारित समयसीमा बीतने पर जांच अधिकारी (L1) को बदलकर मामला L2 स्तर पर भेजा गया।14 फरवरी 2026: पीड़ित की असंतुष्टि के बाद मामला अब L3 (उच्च स्तर) के पास पहुंचा है।16 फरवरी 2026: नया तर्क दिया गया कि यह क्लेम केंद्र शासित ESIC (पंचदीप भवन, इंदौर) के अधीन है।

पीड़ित की पीड़ा और सवालजिलाजीत सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि “आज तक कोई निराकरण नहीं हुआ, जिससे परिवार को भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है।” महज 16 हजार रुपये के क्लेम के लिए फाइलों को एक शहर से दूसरे शहर भेजना और विभागीय स्तर बदलते रहना आम आदमी के लिए कितना तकलीफदेह है, यह इस मामले से साफ झलकता है।

सवाल यह है:अगर मामला केंद्र सरकार के अधीन था, तो राज्य स्तर के ESI अधिकारी पिछले 4 महीनों से फाइल दबाकर क्यों बैठे रहे?क्या एक गरीब परिवार को अपने हक के लिए महीनों तक दफ्तरों की दौड़-धूप करनी पड़ेगी?सीएम हेल्पलाइन के “जन हेतु-जन सेतु” नारे का क्या मतलब रह गया, जब शिकायत के बाद भी सुस्ती बरकरार है?विभाग की चुप्पी और उम्मीदअभी तक ESI विभाग या संबंधित अधिकारियों की ओर से कोई स्पष्ट जवाब या समयबद्ध आश्वासन नहीं आया है।

पीड़ित अब L3 स्तर पर न्याय की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या उच्च अधिकारी इस लापरवाही पर लगाम लगाएंगे या फिर अगली ‘तारीख’ का इंतजार जारी रहेगा?यह मामला ESI योजना की जमीनी हकीकत को उजागर करता है, जहां कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए बनी सामाजिक सुरक्षा योजना कागजी घेरों में फंसकर बेमानी हो जाती है।

स्थानीय लोग और हितग्राही ऐसे मामलों में तेजी से कार्रवाई और पारदर्शी प्रक्रिया की मांग कर रहे हैं ताकि छोटे-छोटे क्लेम भी समय पर निपटाए जा सकें।

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