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त्वरित टिप्पणी कटनी शहर की सड़कें: विकास की आड़ में बर्बादी की कहानी

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शहर की सड़कें सिर्फ पत्थर और डामर की नहीं, बल्कि नागरिकों के विश्वास और पैसों की कहानी भी होती हैं। इन्हें बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है।

शहर की सड़कें सिर्फ पत्थर और डामर की नहीं, बल्कि नागरिकों के विश्वास और पैसों की कहानी भी होती हैं। इन्हें बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है।

कटनी शहर के नागरिक इन दिनों रोज़ाना एक ही दृश्य देख रहे हैं — बनी-बनाई सड़कें फिर से खोदी जा रही हैं। मिशन चौक के पास सागर पुलिया क्षेत्र में सीवर लाइन के लिए फ्लाईओवर की सर्विस रोड को बेरहमी से खोदा जा रहा है। कुछ समय पहले झिंझरी से कुठला तक करोड़ों रुपये की लागत से मॉडल रोड बनाई गई, फिर उसके ऊपर फ्लाईओवर उठा दिया गया, और अब पूरी सड़क को सीवर लाइन ने खोद डाला है।

यह सिर्फ एक जगह की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे शहर में बार-बार दोहराई जा रही त्रासदी है।यह दृश्य देखकर आम आदमी का दिल दुखता है। पहले करोड़ों की सार्वजनिक धनराशि से सड़कें बनाई जाती हैं — टैक्सपेयर्स का पैसा, हमारा पैसा। फिर किसी दूसरे विभाग के प्रोजेक्ट (सीवर, पानी, बिजली, गैस पाइपलाइन या फ्लाईओवर) के नाम पर उन्हें बिना सोचे-समझे खोद दिया जाता है। कुछ साल बाद फिर से पैसे खर्च करके सड़कें बनानी पड़ती हैं।

इस चक्र में न तो समय बचता है, न पैसा, और न ही नागरिकों की सुविधा।सवाल उठता है — क्या शहर बिना प्लानिंग के चल रहा है?क्या टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग, नगर निगम की प्लानिंग शाखा, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट या अन्य संबंधित एजेंसियां सिर्फ कागजों पर प्लान बनाती हैं? अगर सीवर लाइन का काम शहर में करना ही था, तो क्या नीति-निर्माताओं को यह पहले से पता नहीं था? क्या फ्लाईओवर डिजाइन करते समय या मॉडल रोड बनाते समय सीवरेज नेटवर्क का समन्वय नहीं किया जा सकता था?

वास्तव में, यह समन्वय की कमी और अल्पकालिक सोच का नतीजा है। एक विभाग सड़क बनाता है, दूसरा उसे खोदता है। ठेकेदारों को समयबद्धता और गुणवत्ता का दबाव कम होता है। परिणामस्वरूप, शहर की सड़कें बार-बार उखड़ती हैं, गड्ढे बनते हैं, यातायात बाधित होता है, धूल-कीचड़ फैलता है और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ता है।यह सिर्फ कटनी की समस्या नहीं है। कई भारतीय शहरों में यही हाल है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम इसे स्वीकार कर लें। जनता का पैसा होली नहीं खेला जाना चाहिए।

हर बार सड़क खोदने और बनाने पर खर्च होने वाला रुपया स्कूलों, अस्पतालों, सफाई या बेहतर बुनियादी ढांचे पर लग सकता था।क्या समाधान संभव है?हां, बिल्कुल। जरूरत है समग्र और एकीकृत शहरी नियोजन की:सभी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स (सड़क, सीवर, फ्लाईओवर, पानी, बिजली) के लिए मास्टर प्लान में पहले से समन्वय अनिवार्य किया जाए।Utility Corridor का प्रावधान रखा जाए, ताकि भविष्य में सड़क खोदने की जरूरत कम पड़े।अलग-अलग विभागों के बीच सिंगल विंडो सिस्टम और समयबद्ध समन्वय समिति बनाई जाए।

ठेकेदारों पर सख्त शर्त लगाई जाए कि खोदी गई सड़क को तय समय में बेहतर गुणवत्ता से बहाल करना अनिवार्य हो, अन्यथा भारी जुर्माना।जिम्मेदारी तय हो — अगर बिना समन्वय के सड़क खोदी गई, तो संबंधित अधिकारी और विभाग पर जवाबदेही हो।कटनी जैसे शहर, जो कोयला, सीमेंट और लॉजिस्टिक्स हब के रूप में विकसित हो रहे हैं, को सस्टेनेबल और स्मार्ट तरीके से विकसित होने की जरूरत है। बार-बार खोद-खोदकर विकास नहीं, बल्कि दूरदर्शी प्लानिंग से विकास होता है।

नागरिकों का सवाल जायज है — क्या यह सिलसिला हमेशा चलता रहेगा? क्या हमारा टैक्स सिर्फ ठेकेदारों और अस्थायी कामों की होली बनाने के लिए है?समय आ गया है कि नगर निगम, प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करें। बेहतर नियोजन से ही शहर सुंदर, सुविधाजनक और टिकाऊ बन सकता है। अन्यथा, विकास के नाम पर यह बर्बादी का चक्र चलता रहेगा — और सबसे ज्यादा नुकसान आम कटनीवासी को होगा।

शहर की सड़कें सिर्फ पत्थर और डामर की नहीं, बल्कि नागरिकों के विश्वास और पैसों की कहानी भी होती हैं। इन्हें बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है।

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