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कटनी लाल पहाड़ी: जिम्मेदार क्यों बेपरवाह? कौन करेगा शासकीय संपत्तियों की रक्षा?

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यह सिर्फ कटनी का मुद्दा नहीं, बल्कि समूचे लोकतंत्र की साख का सवाल है। समय अब भी है – लेकिन बहुत कम।

यह सिर्फ कटनी का मुद्दा नहीं, बल्कि समूचे लोकतंत्र की साख का सवाल है। समय अब भी है – लेकिन बहुत कम।

कटनी शहर के बीचोबीच, बरगवां क्षेत्र में लाल पहाड़ी खड़ी है – न केवल भौगोलिक ढांचा, बल्कि शासकीय संपत्ति का प्रतीक। 1906-07 के मिसल रिकॉर्ड के अनुसार, ग्राम बरगवां का खसरा नंबर 209 कुल 69.55 एकड़ सरकारी पहाड़ के रूप में दर्ज था। यह जमीन राष्ट्रीय राजमार्ग के निकट स्थित है, जिसकी बाजार मूल्य करोड़ों में आंकी जाती है।

फिर भी, दशकों से यह पहाड़ी भूमाफियाओं, अवैध खननकर्ताओं और संदिग्ध कब्जों का शिकार बनी हुई है। प्रशासनिक अधिकारियों की बेपरवाही, निगम की संदिग्ध एनओसी और रिकॉर्ड की अस्पष्टता ने इसे एक ऐसा प्रकरण बना दिया है, जो सिर्फ एक स्थानीय विवाद नहीं, बल्कि हमारे शासन तंत्र की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी पर सवाल उठाता है।हाल के दिनों में यह मुद्दा फिर सुर्खियों में आया है।

मार्च 2026 में नगर पालिका निगम द्वारा 2018 में जारी की गई एक एनओसी पर घोटाले का आरोप लगा है। खसरा नंबर 209/5 की 0.081 हेक्टेयर शासकीय भूमि (नगर सुधार न्यास योजना संख्या 3 और 17 के तहत अधिग्रहित) के लिए पीआर डन के नाम पर अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी किया गया। आरोप है कि यह फर्जी तथ्यों और गलत अदालती आदेशों (जो 209/4 और 210/1 से संबंधित थे) के आधार पर दिया गया।

हाईकोर्ट का स्टे ऑर्डर मौजूद होने के बावजूद एनओसी जारी हुई और भूमि बाद में निजी हाथों में बिक गई। शिकायतकर्ताओं ने कलेक्टर आशीष सिंह और निगम आयुक्त से इस एनओसी को तुरंत निरस्त करने तथा दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है।इसी क्रम में हाल ही में एलआईसी कार्यालय से सटी करीब 25 हजार वर्ग फीट जमीन पर रात के अंधेरे में सीमेंट की बाउंड्री वॉल बनाई जा रही है।

दावेदार इसे निजी बताते हैं, लेकिन स्थानीय लोग पूछते हैं – अगर दस्तावेज ठीक हैं तो निर्माण दिन के उजाले में क्यों नहीं? रिकॉर्ड की अस्पष्टता का फायदा उठाकर सरकारी हिस्से को निजी बनाने की कोशिशें लगातार हो रही हैं। पहले भी जेसीबी से खुलेआम खुदाई, खनिज विभाग की खामोशी और माफिया के हाथों दिन-रात लूट की खबरें आ चुकी हैं।175be7यह बेपरवाही महज प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि एक गहरी वैचारिक विफलता है।

शासकीय संपत्ति जनता की संपत्ति होती है – वह करदाताओं के पैसे से बनी या अधिग्रहित होती है। इसे सुरक्षित रखना न केवल कानूनी, बल्कि नैतिक दायित्व है। फिर क्यों जिम्मेदार अधिकारी बेपरवाह बने रहते हैं? संभवतः भ्रष्टाचार का नेटवर्क, राजनीतिक संरक्षण, नौकरशाही की जड़ता और जवाबदेही की कमी इसका कारण है। जब उच्चाधिकारी जांच दल गठित करते हैं, सीमांकन का आदेश देते हैं, लेकिन वर्षों तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती, तो सवाल उठता है – क्या यह जानबूझकर की गई उपेक्षा है?

क्या शहर के बीच की अरबों की संपत्ति को लूटने का खेल चल रहा है, जबकि दूर-दराज के गांवों में सरकारी जमीन पहले ही कब्जे में चली गई?यह प्रकरण बड़े पैमाने पर शासकीय संपत्तियों की सुरक्षा की चुनौती को उजागर करता है। यदि कटनी जैसे जिले में, जहां कलेक्टर और निगम आयुक्त सीधे निगरानी रखते हैं, लाल पहाड़ी जैसी संपत्ति सुरक्षित नहीं रह सकती, तो राज्य के अन्य हिस्सों में क्या हाल होगा?

पर्यावरणीय नुकसान, सार्वजनिक धन का अपव्यय और जनता में शासन के प्रति अविश्वास – ये सब इसके दुष्परिणाम हैं। भारतीय संविधान की भावना में संपत्ति का संरक्षण और समान न्याय सिर्फ निजी नागरिकों तक सीमित नहीं; यह राज्य की संपत्तियों पर भी लागू होता है। जब राज्य खुद अपनी संपत्ति की रक्षा नहीं कर पाता, तो वह विकास, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय के अपने वादों को कैसे पूरा करेगा?समाधान केवल जांच रिपोर्ट या एक-दो निलंबनों से नहीं निकलेगा।

जरूरत है पारदर्शी राजस्व रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण, पुराने मिसलों की सत्यापित जांच, सख्त कानूनी प्रावधानों का पालन और नागरिक निगरानी का। कलेक्टर, निगम आयुक्त और खनिज विभाग को न सिर्फ रिपोर्ट मांगनी चाहिए, बल्कि दोषियों पर तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही, जनता को भी सक्रिय होना होगा – सूचना का अधिकार, आरटीआई और सामूहिक आवाज के माध्यम से।लाल पहाड़ी सिर्फ एक पहाड़ी नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता का परीक्षण है।

अगर आज हम इसकी रक्षा नहीं करेंगे, तो कल कौन सी सरकारी संपत्ति बचेगी? जिम्मेदारों की बेपरवाही को चुनौती देते हुए हमें पूछना होगा – कौन करेगा शासकीय संपत्तियों की रक्षा? जवाब स्पष्ट है: वे अधिकारी जो अपनी जिम्मेदारी निभाएं, और वे नागरिक जो चुप नहीं रहें।

यह सिर्फ कटनी का मुद्दा नहीं, बल्कि समूचे लोकतंत्र की साख का सवाल है। समय अब भी है – लेकिन बहुत कम।

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