त्वरित टिप्पणी अवैध खनन का सात वर्षीय सिलसिला: खनिज विभाग की ‘देर से जागी’ चेतना और उठते सवाल
क्या खनिज विभाग इस बार वाकई सख्ती दिखाएगा या फिर अगली बार फिर कोई नया वायरल वीडियो इंतजार कर रहा होगा? समय बताएगा।
क्या खनिज विभाग इस बार वाकई सख्ती दिखाएगा या फिर अगली बार फिर कोई नया वायरल वीडियो इंतजार कर रहा होगा? समय बताएगा।

कटनी। सात साल तक बंद पड़ी खदान में दो वर्षों से धड़ल्ले से लाइमस्टोन का अवैध उत्खनन चलता रहा, और जब सोशल मीडिया पर खबरें वायरल हुईं तब जाकर खनिज विभाग की टीम ‘एक्शन’ में आई। कैमोर थाना क्षेत्र के ग्राम खिरवा (नंबर दो) में यह घटना विजयराघवगढ़ क्षेत्र की है, जहां विभाग ने हाल ही में एक पोकलेन मशीन जब्त कर अपनी सक्रियता दिखाने का प्रयास किया, लेकिन स्थानीय लोग इसे महज दिखावा बता रहे हैं।यह मामला केवल एक खदान का नहीं, बल्कि खनिज विभाग की निगरानी व्यवस्था, जवाबदेही और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
लंबे समय से चली आ रही लापरवाहीजिस खदान को कागजों पर सात वर्ष पूर्व बंद घोषित कर दिया गया था, वहां पिछले दो वर्षों से नियमित रूप से लाइमस्टोन निकाला जा रहा था। सवाल यह है कि खनिज विभाग का क्षेत्रीय इंस्पेक्टर इन सात वर्षों में क्या कर रहा था? क्या नियमित निरीक्षण होते थे? अगर होते थे, तो अवैध उत्खनन कैसे अंजाम दिया जा सका? और अगर निरीक्षण नहीं होते थे, तो विभाग की पूरी मशीनरी किस काम में व्यस्त थी?सामान्य नागरिक जब अपनी जमीन पर मामूली मिट्टी खोदता है या छोटा-मोटा निर्माण कार्य करता है, तब खनिज विभाग तुरंत सक्रिय हो जाता है।
भारी रिकवरी वसूली जाती है, नोटिस जारी होते हैं और धौंस दिखाई जाती है। लेकिन जब लाखों-करोड़ों रुपये का लाइमस्टोन अवैध रूप से निकाला जा रहा हो, तब विभाग की आंखें क्यों बंद रहती हैं? यह दोहरा मापदंड क्यों?सोशल मीडिया का दबाव और ‘दिखावटी’ कार्रवाईजब तक सोशल मीडिया पर वीडियो और शिकायतें नहीं वायरल हुईं, विभाग चुपचाप तमाशा देखता रहा। जैसे ही सार्वजनिक दबाव बढ़ा, रात के अंधेरे में छापा मारा गया, पोकलेन जब्त की गई और ऑपरेटर भाग निकला। ग्रामीणों का कहना है कि यह कार्रवाई असली दोषियों तक नहीं पहुंच रही, बल्कि केवल सतही स्तर पर है।अब सवाल ये उठ रहे हैं:इन दो वर्षों में कितना लाइमस्टोन निकाला गया?
उसकी मात्रा की नाप-जोख क्यों नहीं की जा रही?अवैध खनन से हुए पर्यावरणीय नुकसान का आकलन कब होगा?वास्तविक माफिया और उनके संरक्षक कौन हैं?क्या विभाग कुछ लोगों को बचाने की कोशिश कर रहा है?बड़े सवाल और जरूरी सबकखनिज संपदा जनता की संपत्ति है। इसका दोहन कानून के दायरे में, पारदर्शी तरीके से और पर्यावरण को ध्यान में रखकर होना चाहिए। लेकिन बार-बार ऐसे मामले सामने आते हैं जो बताते हैं कि विभाग की निगरानी प्रणाली या तो कमजोर है या फिर कुछ हितों से प्रभावित।कटनी जैसे खनिज समृद्ध जिले में अवैध खनन की घटनाएं कोई नई नहीं हैं। रेत, लाइमस्टोन, गिट्टी—हर जगह यही कहानी दोहराई जा रही है।
अगर विभाग समय रहते सख्ती नहीं बरतता, तो न केवल सरकारी राजस्व का भारी नुकसान होगा, बल्कि पर्यावरण भी बर्बाद होगा और स्थानीय लोगों का विश्वास टूटेगा।जरूरत है सख्ती की, नहीं तो सिर्फ दिखावे कीखनिज विभाग को अब केवल एक मशीन जब्त करने या एक छापा मारने से आगे बढ़कर सोचना होगा। पूरी जांच हो, दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो, अवैध खनन की मात्रा का सही आकलन हो और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस तंत्र विकसित किया जाए।सोशल मीडिया ने एक बार फिर साबित कर दिया कि जनता की नजर अब सरकारी विभागों पर भी है। अगर विभाग अपनी छवि सुधारना चाहता है, तो उसे दिखावे की बजाय वास्तविक कार्रवाई करनी होगी। देर से जागना बेहतर है देर से सोने से, लेकिन अब जागकर पूरी तरह जागना भी जरूरी है।
क्या खनिज विभाग इस बार वाकई सख्ती दिखाएगा या फिर अगली बार फिर कोई नया वायरल वीडियो इंतजार कर रहा होगा? समय बताएगा।
