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लल्लू भैया की तलैया अब सिर्फ पानी का कुंड नहीं रही। वह हमारी सामूहिक चेतना का आईना बन गई है

लल्लू भैया की तलैया: एक मिटती विरासत और प्रशासनिक विश्वासघात की कहानी

लल्लू भैया की तलैया अब सिर्फ पानी का कुंड नहीं रही। वह हमारी सामूहिक चेतना का आईना बन गई है


कटनी शहर की धड़कन में एक बार एक तलैया थी — लल्लू भैया की तलैया। सदियों से शहर की प्यास बुझाती, वर्षा जल संग्रहण करती और पर्यावरण संतुलन बनाए रखती यह तलैया आज मात्र 13 हजार वर्गफीट के छोटे से अवशेष तक सिमट गई है। एक लाख तीन हजार वर्गफीट के मूल क्षेत्रफल में से करीब 90 हजार वर्गफीट को मलबे, डस्ट और मुरम से पाट दिया गया। यह केवल एक तलैया का सिकुड़ना नहीं है, बल्कि हमारी सभ्यता की स्मृति, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और शासनिक ईमानदारी के क्रमिक हत्याकांड की दास्तान है।
रिकॉर्ड में छेड़छाड़, वास्तविकता में हत्या
1907-08 के मिशल बंदोबस्त में साफ-साफ दर्ज था — खसरा नंबर 1318, रकबा 2.60 एकड़, प्रकार: पानी, कैफियत: तलैया। लेकिन फिर शुरू हुआ वह खेल जो भारत के कई शहरों में दोहराया जा रहा है — रिकॉर्ड में फेरबदल।
1979 में तत्कालीन अधिकारी ने “आम निस्तार” का उल्लेख हटा दिया। 1999 में संभागीय आयुक्त ने फिर विलोपित कर दिया। 2019 में दबाव में पुनः दर्ज किया गया, लेकिन तब तक बहुत कुछ खत्म हो चुका था। यह कोई प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि सुविचारित साजिश थी। हर बार जब रिकॉर्ड बदला गया, भूमि पर मलबा बढ़ता गया। प्रभावशाली लोग और भूमाफिया खुलेआम तलैया को चरागाह बना रहे थे, जबकि अधिकारी आदेश बदलते रहे।
यह प्रक्रिया मात्र कटनी तक सीमित नहीं है। देश भर में जलाशयों, तालाबों और नालों को “भूमि” में बदलने का यही फॉर्मूला अपनाया जा रहा है — पहले रिकॉर्ड बदलो, फिर अतिक्रमण को वैधता दो।
विकास का झूठ और पर्यावरणीय अपराध
आज नगर निगम जलगंगा संवर्धन अभियान चला रहा है। मशीनें लगाकर बचे हुए छोटे से हिस्से की सफाई और गहरीकरण हो रहा है। यह देखकर व्यंग्य का भाव उभरता है — जिस तलैया को हमने खुद पाट दिया, उसी के बचे हुए टुकड़े को अब “संरक्षण” का नाम देकर दिखावा कर रहे हैं।
पिछले पांच वर्षों में तलैया का बड़ा हिस्सा समतल मैदान में बदल गया। जहां कभी पानी लहराता था, वहां अब निर्माण मलबा है। कटनी जैसे शहरों में जहां भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है, वहां प्राकृतिक जलस्रोतों को नष्ट करना न सिर्फ लापरवाही है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के साथ किया गया खुला अपराध है।
सवाल शासन व्यवस्था पर
सबसे गंभीर प्रश्न यह है — इतने सालों तक यह सब कैसे होता रहा? राजस्व विभाग, नगर निगम, कलेक्टर कार्यालय — सभी मौन साधे रहे। हाईकोर्ट में पार्षद मौसूफ अहमद बिट्टू की जनहित याचिका के बाद नोटिस जारी हुए, लेकिन मैदान में अभी भी वही स्थिति है।
क्या प्रशासन सच में इतना असहाय है? या फिर कुछ प्रभावशाली हाथों की मिलीभगत इसे संभव बना रही है? जब रिकॉर्ड ही बदल दिए जाते हैं, तो कानून की बात करना व्यर्थ हो जाता है।
यह सिर्फ एक तलैया नहीं है
लल्लू भैया की तलैया का मामला प्रतीकात्मक है। यह दर्शाता है कि हम कैसे सतत विकास के नाम पर असतत लूट का मॉडल अपना रहे हैं। हम नदियों, तालाबों और वनों को नष्ट कर “स्मार्ट सिटी” का सपना देख रहे हैं। लेकिन प्रकृति का हिसाब बहुत क्रूर होता है। भविष्य में जब जल संकट चरम पर होगा, तब हम इन्हीं पटी हुई तलैयों को याद करेंगे।
समाधान क्या है?
तलैया के मूल 2.60 एकड़ क्षेत्र का वैज्ञानिक सीमांकन हो।
सारे भराव हटाए जाएं और मूल स्वरूप बहाल किया जाए।
दोषी अधिकारियों और भूमाफियाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो।
सभी शहरों में जलाशयों की डिजिटल मैपिंग और सख्त कानूनी सुरक्षा हो।
लल्लू भैया की तलैया अब सिर्फ पानी का कुंड नहीं रही। वह हमारी सामूहिक चेतना का आईना बन गई है — कि हम अपनी विरासत को कितनी आसानी से बेच रहे हैं और अपने भविष्य को कितनी जल्दबाजी में नष्ट कर रहे हैं।
अगर हम इसे बचाने में असफल रहे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें सिर्फ लुटेरों और मूकदर्शकों के रूप में याद रखेंगी — न कि संरक्षकों के रूप में।
समय अब भी है, लेकिन बहुत कम है।

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