बड़वारा में ‘जहर उगलती’ 12 टायर ऑयल फैक्टरियां! विधायक ने सीएम को लिखा पत्र, उच्च स्तरीय जांच की मांग
क्या इन फैक्टरियों पर लगाम कसी जाएगी या फिर पत्र फाइलों में ही दब जाएगा? यह आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा।
क्या इन फैक्टरियों पर लगाम कसी जाएगी या फिर पत्र फाइलों में ही दब जाएगा? यह आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा।

कटनी/बड़वारा (17 जून 2026) – बड़वारा विधानसभा क्षेत्र में पुराने टायरों से तेल निकालने वाली 12 फैक्टरियों ने क्षेत्र को प्रदूषण की भट्ठी में बदल दिया है। स्थानीय विधायक धीरेंद्र बहादुर सिंह ने खुद मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इन इकाइयों की तत्काल जांच और कठोर कार्रवाई की मांग की है। विधायक के इस हस्तक्षेप ने पूरे मामले को नई तूल दे दी है।विधायक ने पत्र में स्पष्ट लिखा है कि जनपद पंचायत बड़वारा क्षेत्र में संचालित इन टायर पायरॉलिसिस इकाइयों से भारी मात्रा में जहरीला धुआं, दुर्गंध और विषैले तत्व निकल रहे हैं, जो आसपास के गांवों की हवा को लगातार प्रदूषित कर रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि इन फैक्टरियों में पुराने टायर जलाकर तेल निकाला जा रहा है, जिसका सीधा असर उनकी सेहत और खेती पर पड़ रहा है।
ग्रामीणों पर स्वास्थ्य संकटस्थानीय लोगों के अनुसार, फैक्टरियों से निकलने वाले काले धुएं और रसायनों के कारण श्वास संबंधी बीमारियां, आंखों में जलन और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ गई हैं। कृषि भूमि पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ रहा है।प्रमुख सवालविधायक के पत्र ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं:यदि 12 इकाइयां लंबे समय से संचालित हैं तो प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उद्योग विभाग और स्थानीय प्रशासन अब तक क्या कर रहे थे?क्या इन सभी इकाइयों के पास वैध पर्यावरणीय स्वीकृतियां (Consent to Establish & Operate) हैं?क्या नियमित निरीक्षण होते रहे और प्रदूषण नियंत्रण के मानक पूरे किए जा रहे हैं?यदि सब कुछ ठीक था तो विधायक को मुख्यमंत्री स्तर पर हस्तक्षेप क्यों करना पड़ा?12 कंपनियों की सूची संलग्नविधायक ने मुख्यमंत्री को भेजे पत्र के साथ सभी 12 इकाइयों की विस्तृत सूची भी संलग्न की है।
उन्होंने उच्च स्तरीय जांच समिति गठित कर इन इकाइयों की पर्यावरणीय स्वीकृतियों, संचालन की वैधता और प्रदूषण मानकों का सख्ती से परीक्षण करने की मांग की है। उल्लंघन पाए जाने पर तत्काल कार्रवाई और इकाइयों को बंद करने की भी मांग की गई है।अब नजरें सरकार और प्रशासन परयह मामला अब केवल पर्यावरण प्रदूषण का नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य और सरकारी विभागों की जवाबदेही का भी बन गया है। ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि सरकार और संबंधित विभाग इस पत्र पर कितनी तेजी से और कितनी गंभीरता से कार्रवाई करते हैं।
क्या इन फैक्टरियों पर लगाम कसी जाएगी या फिर पत्र फाइलों में ही दब जाएगा? यह आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा।
