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Guru purnima : गुरु बिन भव निधि तरइ न कोई। जौ बिरंचि संकर सम होई ।।

Guru purnima: गुरु के बिना कोई भव निधि नहीं पर नहीं कर सकता। तुलसी बाबा ने कहां है कि यदि कोई शंकर और ब्रह्मा के सामान भी है तब भी उसे गुरु की जरूरत पड़ेगी।
गुरु का अर्थ है अंधकार में प्रकाश का मार्ग दिखाने वाला। इस संबंध में एक कहानी है एक गुरु एक बार बैठे थे। उनके साथ उनका प्रिय शिष्य था। इसी दौरान एक शिष्य और आया। उसने गुरु से पूछा। की हे गुरुदेव जीवन क्या है। संघर्ष है या खेल? गुरुदेव ने शिष्य से कहा जीवन संघर्ष मय है। इसके बाद एक दूसरा शिष्य वहां आया। उसने भी गुरु से यही सवाल किया। गुरु ने कहा जीवन खेल है। जब दोनों शिष्य चले गए तब पास खड़ी शिष्य ने जिज्ञासा वस पूछा‌ कि हे गुरुदेव आपने एक ही प्रश्न का अलग-अलग उत्तर क्यों दिया। गुरु ने अपने प्रिय शिष्य से कहा। तू चिंता मत कर दोनों उत्तर सही हैं। जिसके पास मेरे जैसा गुरु है। उसके लिए जीवन खेल है, जिसके पास गुरु नहीं है उसका जीवन संघर्ष मय है।
सदगुरु का अर्थ शिक्षक या आचार्य नहीं है । शिक्षक अथवा आचार्य हमें थोड़ा-बहुत ऐहिक ज्ञान देते हैं लेकिन सदगुरु तो हमें निजस्वरूप का ज्ञान दे देते हैं । जिस ज्ञान की प्राप्ति के बाद मोह उत्पन्न न हो, दुःख का प्रभाव न पड़े और परब्रह्म की प्राप्ति हो जाए ऐसा ज्ञान गुरुकृपा से ही मिलता है । उसे प्राप्त करने की भूख जगानी चाहिए । इसीलिये कहा गया है।

गुरु गोबिन्द दोउ खड़े, काके लागु पाँव ।
बलिहारी गुरु आपने, जिन गोबिन्द दियो बताय ।।

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