स्वच्छता का पाठ और कचरे का अमल: कटनी में दोहरी सच्चाई

सवाल यह है कि हम कब तक इस विरोधाभास को सहते रहेंगे?

एक तरफ आयुक्त तपस्या परिहार राहगिरी डे पर नागरिकों को स्वच्छता का महत्व बताती हैं, शहर को स्वच्छता रैंकिंग में बेहतर स्थान दिलाने के लिए लोगों को प्रेरित करती हैं। दूसरी तरफ, जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी उनकी भली मंशा पर लगातार पानी फेरते नजर आ रहे हैं। यह विरोधाभास कटनी शहर की वर्तमान स्थिति को बखूबी दर्शाता है।शहर के जगन्नाथ चौक के पास स्थित दो ब्रिजों के बीच का इलाका इन दिनों कचरे का अड्डा बन गया है। आम लोग खुलेआम यहां कचरा फेंक रहे हैं और वह कचरा सीधे कटनी नदी में जा गिर रहा है। ठीक उसी समय जब बाहर से मशीनें मंगवाकर नदी की सफाई का खर्चा उठाया जा रहा है, उसी नदी को कुछ लोग और कुछ अधिकारियों की उदासीनता मिलकर लगातार प्रदूषित कर रहे हैं।यह दृश्य बेहद विडंबनापूर्ण है।

एक ओर महंगी मशीनें नदी की गहराई से कचरा निकाल रही हैं, दूसरी ओर ऊपर वाले पुलों के बीच कचरा फेंकने की प्रक्रिया निर्बाध चल रही है। सफाई का प्रयास और प्रदूषण का सिलसिला साथ-साथ चल रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि स्वच्छता अभियान केवल दिखावा भर बनकर रह गया है। जागरूकता अभियान चले, पोस्टर लगे, नारे लगे, लेकिन मूल समस्या — कचरा प्रबंधन, निगरानी और दंड व्यवस्था — पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा।जब अधिकारी ही उदासीन हों तो जनता क्या करे?लोगों को बार-बार स्वच्छता का पाठ पढ़ाया जा रहा है, लेकिन जब वे देखते हैं कि जगन्नाथ चौक जैसे प्रमुख स्थान पर कचरा फेंकने की घटनाएं हो रही हैं और प्रशासन चुप्पी साधे बैठा है, तो उनके मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

स्वच्छता किसी एक व्यक्ति या आयुक्त की इच्छाशक्ति से नहीं आती, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की सतर्कता, निरंतर निगरानी और सख्ती से आती है।अगर आयुक्त साहब की अच्छी मंशा को उनके ही अधीनस्थ अधिकारी कमजोर कर रहे हैं, तो शहर की स्वच्छता रैंकिंग सुधारने का सपना सिर्फ कागजी अभ्यास बनकर रह जाएगा। नदी की सफाई के लिए मशीनें लाना सराहनीय है, लेकिन अगर स्रोत पर ही कचरा गिरता रहे तो यह ‘कुंआ खोदकर मिट्टी ढकने’ वाला प्रयास साबित होगा।

समय है आत्मचिंतन काकटनी को स्वच्छ शहर बनाने का सपना देखा जा रहा है, तो पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि स्वच्छता का अभियान केवल एक दिवसीय कार्यक्रम या फोटो सेशन तक सीमित न रहे। जगन्नाथ चौक जैसे संवेदनशील इलाकों में नियमित निगरानी, CCTV, सख्त जुर्माना और कचरा संग्रहण की बेहतर व्यवस्था तुरंत लागू की जानी चाहिए।आयुक्त तपस्या परिहार से अपील है कि वे न सिर्फ जागरूकता अभियान चलाएं, बल्कि अपने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सख्त नजर रखें। क्योंकि स्वच्छता तभी संभव है जब नारा और अमल दोनों एक साथ चलें।अभी फिलहाल शहर दोहरी सच्चाई का सामना कर रहा है — एक तरफ स्वच्छता का सुंदर भाषण, दूसरी तरफ नदी में गिरता कचरा।

सवाल यह है कि हम कब तक इस विरोधाभास को सहते रहेंगे?

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